Description
विला नंबर 1824
लेखक – डॉ रूनझुन सक्सेना शुभानन्द
पृष्ठ – 206
सात करोड़ का सपना… या सात पुश्तों का श्राप? जब रेणुका और अमोल को लोनावला में विला नंबर 1824 मिलती है, तो उन्हें लगता है जैसे किस्मत ने उनकी झोली भर दी। सात करोड़ की संपत्ति… सिर्फ़ एक करोड़ में जो हाथ आ लगी थी। मगर ये खुशी ज्यादा देर न टिक सकी। पहली रात से ही शुरू हो गया एक अनोखा सिलसिला—अजीब आवाज़ें, खून के धब्बे, और एक बच्चे की रुलाई जो कभी थमती नहीं।
बगीचे में दफ़न मिलती हैं सौ साल पुरानी हड्डियाँ। बेसमेंट में छुपा है एक रहस्यमयी कमरा। और हर रात, दीवारों से कोई फुसफुसाता है—
“यह घर तुम्हारा नहीं… यह घर मेरा है।”
एक अनोखा षड्यंत्र। एक अधूरा बदला। और एक ऐसा ख़ज़ाना जिसकी क़ीमत… जान से भी ज़्यादा है। क्या रेणुका अपने परिवार को बचा पाएगी? या फिर 1824 का इतिहास… एक बार फिर दोहराएगा खुद को?
‘चालीसा का रहस्य’ की लेखिका की कलम से निकली एक हैरतअंगेज मिस्ट्री।

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